बंबई की चमक-दमक में पैसा ही नहीं, सब कुछ था। एंटरटेनमेंट... एंटरटेनमेंट... और एंटरटेनमेंट... जहाँ सारी रंगीनियाँ थीं। इन रंगीनियों की हफ़्ता-वसूली से पैदा हुए बंबई के अंडरवर्ल्ड में हाजी मस्तान, करीम लाला और वरदराजन मुलदियार थे। दक्षिण भारतीयों के ख़िलाफ़ बाला साहेब ठाकरे का आंदोलन हिट हुआ और मराठी मूल के दाऊद इब्राहीम ने सबको चलता कर दिया। उसने ख़ुद को शहंशाह बना लिया। अबू सलेम के हाथों टी-सीरीज़ वाले गुलशन कुमार की दिन-दहाड़े हत्या ने अंडरवर्ल्ड का साम्राज्य मज़बूत कर दिया... और फिर वह मोड़ आया जिसने अंडरवर्ल्ड को बाँट दिया।
अपराध की न कोई जाति होती है, न धर्म, लेकिन मज़हब आड़े आ गया। बाबरी मस्जिद विध्वंस से अचानक दाऊद इब्राहीम के अंदर का मुसलमान जाग उठा। छोटा राजन, अरुण गवली और बबलू श्रीवास्तव का हिंदुत्व उबाल मार गया। अंडरवर्ल्ड ध्रुवीकरण का शिकार हो गया। इसका अंतःपुर बेचैन हो उठा। बंबई बम ब्लास्ट से दाऊद और बबलू की अदावत ने पासा पलटा, आफ़ताब अंसारी सामने आया। गौतम अडाणी का अपहरण, ताबडतोड़ बमबाज़ी, हत्याएँ, बलात्कार और फ़ायरिंग... फिर लारेंस बिश्नोई का उदय... नरम आतंकवाद और छिड़ गया एक ‘अंतहीन’ घमासान।