जीवन के खुरदरे यथार्थ से जूझते हुए विपरीत परिवेश में भी नियति के विरुद्ध संघर्षरत नायक और नायिका के पल्लवित हुए सरस प्रेम की अद्भुत गाथा।
अपने जीवन-संघर्ष, ज़िम्मेदारियों और दुर्भाग्य से लड़ते हुए प्रेम की कोमल ऊर्जा किस प्रकार इस लड़ाई की ताक़त बन सकती है, यही ‘अलकनंदा’ उपन्यास का केंद्रीय कथ्य है। अलकनंदा की कहानी दुख, भय, रोमांच और हताशा के बीच पनपते हुए सात्विक प्रेम के धरातल पर बड़े रोचक ढंग से सदिश होती है। इलाहाबाद के शैक्षिक परिवेश में जीवन की दुरूहताओं के बीच युवावस्था के निस्वार्थ प्रेम की यह कहानी अपनी पूरी गंभीरता के साथ चौंका देने वाले मोड़ों से गुज़रती हुई अपने सुखद गंतव्य तक पहुँचती है।
बकौल लेखक, ‘अलकनंदा’ के ज़रिये यह भी बताने की सार्थक कोशिश है कि– ‘हार जाना, कोई हार नहीं है, हार को स्वीकार कर लेना हार है। क्योंकि किसी भी विजय की संभावना लड़ने की प्रक्रिया से होकर ही निकलती है!’